Sunday, February 1, 2026
कहानी गलता जी की
जयपुर, जो यहाँ के मंदिरों की वजह से छोटी काशी के नाम से मशहूर है, शहर से लगभग 12-13 किलोमीटर दूर अरावलियों की पहाड़ियों की गोद में एक सुंदर सा क्षेत्र बसा हुआ है, जो गलता जी के नाम से मशहूर है । गलता जी जयपुर का एक पौराणिक तीर्थ स्थल है जो मऋषि गालव की कर्मभूमि रही है । यहाँ के कुंड में पानी गोमुख से आता है जिसका स्रोत अज्ञात है । गलता जी के निर्माण के बारे में चाहे जो कहानी रही हो पर मैं आपको वो कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जो मैंने मेरे दादाजी से सुनी थी ।
हजारों समय पहले, जब जयपुर नाम का कोई शहर अस्तित्व में नहीं था, यह संपूर्ण क्षेत्र गहन वन, ऊँचे चट्टानी पहाड़ों और दूर-दूर तक फैली निस्तब्धता से भरा हुआ था । इस स्थान पर मनुष्य का आना दुर्लभ था, क्योंकि पशु-पक्षियों की विचरण स्थली और घने जंगल लोगों को सहज ही भयभीत कर देते थे । उसी काल में, गालव नाम का एक तपस्वी इन पहाड़ियों की ओर बढ़ता जा रहा था । उसके कदम थके हुए थे, पर आँखों में दृढ़ता थी । वे एक ऐसे स्थान की तलाश में थे, जहाँ पर वे निर्बाध तप कर सकें, ध्यान कर सकें और प्रकृति के समीप रहकर आत्मज्ञान प्राप्त कर सकें । विभिन्न स्थलों पर भ्रमण करने के बाद उन्हें अरावली की यह पर्वत-शृंखला अपने कार्य के लिए अत्यंत उपयुक्त लगी । वे घाटी में उतरे और थोड़ी देर बाद एक सपाट जगह पर पहुँचे । यह स्थान स्वाभाविक रूप से गोलाकार था, जैसे प्रकृति ने किसी कारण से इसे ऐसा बनाया हो । यहाँ के पत्थर गहरे भूरे और चिकने थे, जैसे कई बार किसी शक्तिशाली ऊर्जा ने इन्हें गर्म किया और फिर ठंडा किया हो । ऋषि ने पहली बार महसूस किया कि यह भूमि स्थिर नहीं, बल्कि जागृत है। यह वही स्थान था जिसे वे वर्षों से खोज रहे थे । उन्होंने वहीं आश्रम बना लिया और तपस्या आरंभ कर दी ।
पहाड़ों के बीच छोटे-छोटे झरने तो थे, पर स्थायी जलस्रोत नहीं था। तप के प्रारंभिक दिनों में उन्हें पानी के लिए काफी दूरी तय करनी पड़ती थी, किंतु इससे उनका मन विचलित नहीं हुआ । वे सूर्य उगने से पहले उठते, नदी से जल लाते और फिर घोर तप में लीन हो जाते । ऋषि का लक्ष्य केवल देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना नहीं था; वे संसार और आत्मा के रहस्यों को जानना चाहते थे । रात को ऐसा लगता जैसे किसी ने दूरी में भारी वस्तु घसीटी हो । कभी टहनियाँ टूटने की आवाज आती । कभी ऐसा महसूस होता कि कोई बहुत हल्के कदमों से उनके चारों ओर चक्कर लगा रहा है । कई साधक ऐसे संकेतों से डरकर स्थान छोड़ देते, पर ऋषि गालव रुके रहे ।
एक दिन जंगल से निकल कर कहीं से एक शेर वहाँ पर आ गया । वह शेर धीरे धीरे ऋषि की तरफ जाने लगा । उसे देखकर आस पास के पेड़ों के पक्षी ज़ोर ज़ोर से आवाज करने लगे पर ऋषि पर उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा था । वो अपनी तपस्या में उसी तरह से मग्न रहे । वह शेर धीरे धीरे आगे बढ़ा । अभी वो ऋषि पर हमला करने ही वाला था कि ना जाने कहाँ से वहाँ पर सैकड़ों की संख्या में बंदर आ गए और उस शेर पर हमला करने लगे । इतने बंदरों को देख कर वो शेर वहाँ से दुम दबा कर भाग गया ।
आखिरकार ऋषि गालव की घनघोर तपस्या से देवता उनसे प्रसन्न हुए और उनके समक्ष प्रकट हुए । देवताओं ने ऋषि गालव से वर मांगने को कहा । ऋषि ने अपने लिए स्वच्छ जल की मांग की । देवताओं ने आशीर्वाद दिया और उनके आशीर्वाद से पहाड़ को चीरते हुये जल की धारा बह निकली । यह जल न तो वर्षा पर निर्भर था और न ही किसी नदी से आता था, किंतु हमेशा प्रवाहित रहता था । यही जल धीरे-धीरे नीचे आकर एक पवित्र कुंड में इकट्ठा होने लगा, जिसे बाद में गलता कुंड कहा गया । कुंड का पानी इतना साफ था कि उसमें आसमान की परछाई बिल्कुल वैसी ही दिखाई देती थी। ऋषि गालव वापस से अपनी तपस्या में व्यस्त हो गए ।
वक़्त के साथ साथ जयपुर शहर के साथ साथ गलता भी बदलता गया, पर दो चीजें वैसे की वैसे ही रही । एक तो कुंड से निकलते हुये जल की धारा और दूसरा उस स्थान में मौजूद बंदर ।
आज भी लोग दावा करते हैं कि सुबह सूर्योदय से ठीक पहले गलता कुंड पर हल्की सुनहरी धुंध उतरती है । कुछ यात्रियों ने अचानक पानी में किसी वृद्ध साधु की परछाई देखी है । स्थानीय लोग मानते हैं कि वह ऋषि गालव ही हैं । और बंदरों की वह सेना ऋषि गालव की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहती है ।
मेरे दादाजी अब इस दुनियाँ में नहीं है पर मेरे दादाजी की एक बात मुझे आज भी याद है कि गलता सिर्फ एक तीर्थ नहीं है । यह एक कहानी है एक तपस्वी की, एक जागृत भूमि की, और उन पहरेदारों की, जो आज तक अपने वचन पर टिके हैं ।
जब भी कोई व्यक्ति श्रद्धा से यहाँ आता है, पहाड़ों की चट्टानों से लगता है कोई धीमी आवाज़ फिसलकर कह रही हो:
“यह भूमि जीवित है ।
सम्मान के साथ चलो ।”
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