Sunday, February 1, 2026

कहानी गलता जी की

जयपुर, जो यहाँ के मंदिरों की वजह से छोटी काशी के नाम से मशहूर है, शहर से लगभग 12-13 किलोमीटर दूर अरावलियों की पहाड़ियों की गोद में एक सुंदर सा क्षेत्र बसा हुआ है, जो गलता जी के नाम से मशहूर है । गलता जी जयपुर का एक पौराणिक तीर्थ स्थल है जो मऋषि गालव की कर्मभूमि रही है । यहाँ के कुंड में पानी गोमुख से आता है जिसका स्रोत अज्ञात है । गलता जी के निर्माण के बारे में चाहे जो कहानी रही हो पर मैं आपको वो कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जो मैंने मेरे दादाजी से सुनी थी ।
हजारों समय पहले, जब जयपुर नाम का कोई शहर अस्तित्व में नहीं था, यह संपूर्ण क्षेत्र गहन वन, ऊँचे चट्टानी पहाड़ों और दूर-दूर तक फैली निस्तब्धता से भरा हुआ था । इस स्थान पर मनुष्य का आना दुर्लभ था, क्योंकि पशु-पक्षियों की विचरण स्थली और घने जंगल लोगों को सहज ही भयभीत कर देते थे । उसी काल में, गालव नाम का एक तपस्वी इन पहाड़ियों की ओर बढ़ता जा रहा था । उसके कदम थके हुए थे, पर आँखों में दृढ़ता थी । वे एक ऐसे स्थान की तलाश में थे, जहाँ पर वे निर्बाध तप कर सकें, ध्यान कर सकें और प्रकृति के समीप रहकर आत्मज्ञान प्राप्त कर सकें । विभिन्न स्थलों पर भ्रमण करने के बाद उन्हें अरावली की यह पर्वत-शृंखला अपने कार्य के लिए अत्यंत उपयुक्त लगी । वे घाटी में उतरे और थोड़ी देर बाद एक सपाट जगह पर पहुँचे । यह स्थान स्वाभाविक रूप से गोलाकार था, जैसे प्रकृति ने किसी कारण से इसे ऐसा बनाया हो । यहाँ के पत्थर गहरे भूरे और चिकने थे, जैसे कई बार किसी शक्तिशाली ऊर्जा ने इन्हें गर्म किया और फिर ठंडा किया हो । ऋषि ने पहली बार महसूस किया कि यह भूमि स्थिर नहीं, बल्कि जागृत है। यह वही स्थान था जिसे वे वर्षों से खोज रहे थे । उन्होंने वहीं आश्रम बना लिया और तपस्या आरंभ कर दी ।
पहाड़ों के बीच छोटे-छोटे झरने तो थे, पर स्थायी जलस्रोत नहीं था। तप के प्रारंभिक दिनों में उन्हें पानी के लिए काफी दूरी तय करनी पड़ती थी, किंतु इससे उनका मन विचलित नहीं हुआ । वे सूर्य उगने से पहले उठते, नदी से जल लाते और फिर घोर तप में लीन हो जाते । ऋषि का लक्ष्य केवल देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना नहीं था; वे संसार और आत्मा के रहस्यों को जानना चाहते थे । रात को ऐसा लगता जैसे किसी ने दूरी में भारी वस्तु घसीटी हो । कभी टहनियाँ टूटने की आवाज आती । कभी ऐसा महसूस होता कि कोई बहुत हल्के कदमों से उनके चारों ओर चक्कर लगा रहा है । कई साधक ऐसे संकेतों से डरकर स्थान छोड़ देते, पर ऋषि गालव रुके रहे ।
एक दिन जंगल से निकल कर कहीं से एक शेर वहाँ पर आ गया । वह शेर धीरे धीरे ऋषि की तरफ जाने लगा । उसे देखकर आस पास के पेड़ों के पक्षी ज़ोर ज़ोर से आवाज करने लगे पर ऋषि पर उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा था । वो अपनी तपस्या में उसी तरह से मग्न रहे । वह शेर धीरे धीरे आगे बढ़ा । अभी वो ऋषि पर हमला करने ही वाला था कि ना जाने कहाँ से वहाँ पर सैकड़ों की संख्या में बंदर आ गए और उस शेर पर हमला करने लगे । इतने बंदरों को देख कर वो शेर वहाँ से दुम दबा कर भाग गया ।
आखिरकार ऋषि गालव की घनघोर तपस्या से देवता उनसे प्रसन्न हुए और उनके समक्ष प्रकट हुए । देवताओं ने ऋषि गालव से वर मांगने को कहा । ऋषि ने अपने लिए स्वच्छ जल की मांग की । देवताओं ने आशीर्वाद दिया और उनके आशीर्वाद से पहाड़ को चीरते हुये जल की धारा बह निकली । यह जल न तो वर्षा पर निर्भर था और न ही किसी नदी से आता था, किंतु हमेशा प्रवाहित रहता था । यही जल धीरे-धीरे नीचे आकर एक पवित्र कुंड में इकट्ठा होने लगा, जिसे बाद में गलता कुंड कहा गया । कुंड का पानी इतना साफ था कि उसमें आसमान की परछाई बिल्कुल वैसी ही दिखाई देती थी। ऋषि गालव वापस से अपनी तपस्या में व्यस्त हो गए ।
वक़्त के साथ साथ जयपुर शहर के साथ साथ गलता भी बदलता गया, पर दो चीजें वैसे की वैसे ही रही । एक तो कुंड से निकलते हुये जल की धारा और दूसरा उस स्थान में मौजूद बंदर ।
आज भी लोग दावा करते हैं कि सुबह सूर्योदय से ठीक पहले गलता कुंड पर हल्की सुनहरी धुंध उतरती है । कुछ यात्रियों ने अचानक पानी में किसी वृद्ध साधु की परछाई देखी है । स्थानीय लोग मानते हैं कि वह ऋषि गालव ही हैं । और बंदरों की वह सेना ऋषि गालव की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहती है ।
मेरे दादाजी अब इस दुनियाँ में नहीं है पर मेरे दादाजी की एक बात मुझे आज भी याद है कि गलता सिर्फ एक तीर्थ नहीं है । यह एक कहानी है एक तपस्वी की, एक जागृत भूमि की, और उन पहरेदारों की, जो आज तक अपने वचन पर टिके हैं ।
जब भी कोई व्यक्ति श्रद्धा से यहाँ आता है, पहाड़ों की चट्टानों से लगता है कोई धीमी आवाज़ फिसलकर कह रही हो:
“यह भूमि जीवित है ।
सम्मान के साथ चलो ।”

आरक्षण

जी. आर. खन्ना, सीनियर मैनेजर, राजस्थान सरकार, हाँ यही नाम लिखा हुआ था उस नेम प्लेट के ऊपर जो जयपुर शहर की एक पाश कॉलोनी मे बने हुये शानदार मकान के मुख्य द्वार पर लगी हुयी थी । 300 वर्ग गज में फैला हुआ वो मकान किसी बंगले से कम नही था जिसमे बाहर बरामदे मे एक छोटा सा गार्डन भी बना हुआ थ,ा जहां पर एक छतरी के नीचे 2-3 कुर्सियाँ और एक टेबल रखी हुयी थी, जो मकान के मुख्य गेट से साफ नजर आ रही थी । उस गेट के बाहर सफ़ेद रंग का गंदा सा धोती कुर्ता पहना हुआ एक 40-42 साल की आयु वाला ग्रामीण अपने 16-17 साल आयु वाले किशोर बेटे के साथ खड़ा था । बेटे ने नीले रंग का शर्ट और खाखी रंग की पेंट पहन रखी थी, जो उसके सरकारी स्कूल की ड्रेस होने की सूचक थी । उन दोनों बाप बेटो के चेहरो पर थकावट और परेशानी साफ झलक रही थी ।
“छोरा पतो तो योहि छ न? तू मने गलत जगहा तो कोणी ले आयो ।” ग्रामीण ने उस बंगले को अपनी फटी हुयी आंखो से देखकर अपनी देशी भाषा मे अपने बेटे से कहा ।
“हाँ बापू, पतो तो योहि छा । अठी मकाण क बाराना लिख भी रखयों छ । जी. आर. खन्ना यानि गोविंद राम खन्ना सीनियर मैनेजर, राजस्थान सरकार ।” उसके बेटे ने जवाब दिया ।
“नाम तो तू सही बोलयों गोविंद राम पर यो तो खटनवालियों छो, खन्ना किया क होगों ।” वो ग्रामीण आश्चर्य स्वर मे बोला ।
“अब बापू शहरा क माइने नियाकाय ही फेशन चाल रो छ, नाम बदलबा को आजकाल ।”
“असयो भी काय को फेसन कि आछों भलयों नाम ना ही बिगाड़ कर रख देव ।” वो ग्रामीण बड़बड़ाया फिर अपने बेटे से कहा-“अब तू खड़ों खड़ों मारो मुह कायी देख रयो छ । घंटी बजार बुला गोबिंदा न ! बड़ो आदमी बनगो यो तो शहर मे आर । सरकार अतनी कतनी पगार देवे छ, जो अतनों चोखों महल बना रखयों छ ।”
“बजाऊ छू बापू” कहकर उस किशोर ने दरवाजे के पास लगी हुयी घंटी बजाई । दूर कहीं अंदर से घंटी बजने की आवाज आई । थोड़ी देर बाद मकान का अंदर का दरवाजा खुला और उसमे से एक सूट बूट पहने आदमी ने बाहर कदम रखा । धीरे धीरे चलता हुआ वो मुख्य द्वार की और बढ़ा । उसकी चाल में अपने पद और सोसाइटी के गर्व की झलक नजर आ रही थी । उसने अपने घर का मुख्य द्वार खोला और उन दोनों के गंदे कपड़ो की तरफ हिकारत भरी नजर डालता हुआ बोला-
“हेय भिखारी! कहाँ चले आ रहे हो? छुट्टा नहीं है कहीं और जाकर भीख मांगो, भागो यहाँ से ।”
“अरा गोबिंदा मैं भिखारी कोनया । मन्ने ना पहचानो के? म रामफुल थारा गाँव नाथपुरा को । अब थारो बाप सरकारी चाकरी करो छो और तू भी शहर म आर बड़ो आदमी बनगो सरकार म ।”
“ओहह तुम नाथपुरा से आए हो? कहो कैसे आए तुम लोग यहाँ?”
“वो मारो बेटो राकेश अभी गाँव का स्कूल सू बारवी म पास होगों और आग पढ़ब चाओ छ ।”
“तो तुम 12थ मे पास हो गए और आगे पढना चाहते हो, ये तो अच्छी बात है । कितने बने तुम्हारे 12थ में? 3र्ड डीवीजन से पास हुये होंगे क्यू?”
“नहीं अंकल मेरे 12थ मे 80% मार्क्स आए है । पूरे स्कूल में सबसे ज्यादा ।”
“80% मार्क्स! और मेरा बेटा इतने महंगे प्राइवेट स्कूल में पढ़ने के बाद और इतनी ट्यूशन जाने के बाद भी बड़ी मुश्किल से 60 प्रतिशत बना पाया है और ये सरकारी स्कूल में पढ़ कर इतना बना ले आया?” मन ही मन जी. आर. खन्ना ने सोचा पर प्रत्यक्ष में उसका मज़ाक बनाते हुये बोला-“तो अब पढ़ लिख कर क्या कलेक्टकर बनेगा?”
“नहीं अंकल! गाँव के अस्पताल में डॉक्टर कभी आता है कभी नहीं आता, इसलिए लोग बड़ी मुश्किल से अपना इलाज़ करा पाते है । मैं डॉक्टर बनकर उनकी सेवा करना चाहता हूँ ।”
“तो तुम लोग यहाँ क्या करने आए हो? जाओ बनो डॉक्टर !” उसने बड़ी बेरुखी से जवाब दिया । उसका जवाब सुनकर राकेश का मुंह उतर गया । उसने कातर निगाहों से अपने बापू की तरफ देखा ।
“गोबिंदा वो तू तो इतनों बड़ो आदमी बनगो । थोड़ी बहुत पीसा सू मारी मदद कर दे जिसु म मारा बेटा ने तयारी करवा सकु । मारो बेटो जब पढ़ लिखर डॉक्टर बन जाओ लो तो थारा पीसा सूद समेट लोटा दूँगा ।”
“देख रामफुल! पैसे तो अभी नहीं है । शहर मे जितना कमाते है उससे ज्यादा खर्च हो जाते है । वैसे भी क्या करेगा इसे पढ़ा लिखा कर? तेरा बाप जूतियाँ बनाता था, तू भी जूतियाँ बनाता है और तेरा बेटा भी जूतियाँ बना लेगा ।” खन्ना ने उसका मज़ाक उड़ाते हुये कहा ।
“नहीं अंकल! बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था, हमारे समाज की दिशा कोई बदल सकता है तो वो है शिक्षा । इसलिए मैं भी खूब पढना लिखना चाहता हूँ और समाज का भला करना चाहता हूँ ।” राकेश ने जवाब दिया।
“तो जाकर अंबेडकर की बात मान । अंबेडकर ने कहा था कि आधी रोटी खाओ और पढ़ाई करो । तो जाकर खाना कम खा और खूब पढ़ लिख, ऐसे मेरे आगे हाथ क्यू फैला रहा है?”
“बापू! चाल अठ छू । ये कई मदद कोणी कर । यान डर लाग रयो छ, अगर समाज का गरीब बेटा पढ़ लिख जावा ला तो आरक्षण पर से इनका एकाधिकार खत्म हो जाएगा ।” राकेश ने जवाब दिया ।
“अबे साले! आरक्षण जाती के आधार पर दिया है गरीबी के आधार पर नहीं । गरीबी मिटानी है तो सरकार के पास जाकर बोल, बड़ा आया मुझे आरक्षण के लिए लेक्चर देने वाला, भिखारी कहीं का । चल भग यहाँ से और दुबारा नजर मत आना । ना जाने कहाँ कहाँ से चले आते है?” कहते हुये खन्ना ने उनके मुंह के आगे अपने मकान का मुख्य द्वार बड़ी तेजी से बंद किया । पीछे वो दोनों अपनी आंखो मे आँसू लिए वहाँ से वापस लौट पड़े ।

कुछ महीनो बाद नाथपुरा गाँव के एक टूटे फूटे झोपड़ी वाले मकान के आगे एक सूटबूट वाला खड़ा आवाज लगा रहा था ।
“अरे ओ रामफुल, बाहर निकाल जरा ।”
अंदर झोपड़ी से एक फटी हुयी धोती और कुर्ता पहने रामफुल निकला और उस आदमी को देख कर चौंक गया ।
“अरे गोबिंदा! तू, आज अठे किया? तू तो उ दिन मणा पहचानबा सू ही मणा कर दियो छो ।” वो आदमी जो गोविंद राम खन्ना था, उसे देखकर रामफुल ने कहा ।
“पुरानी बाते भुला दे रामफुल! ये देख क्या हो रहा है?”
“क्यू कई होगों?”
“या देख! ये अखबार पढ़ क्या लिखा हुआ हुआ है? ब्राह्मण लोग हमारा आरक्षण खत्म करने मे लगे हुये है । हिंदुवादी नेता बयान दे रहे है कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए, पदोनती मे आरक्षण खत्म कर रहे है, ये फिर से हमे 5000 साल पहले की तरह अपना गुलाम बनाना चाहते है ।”
“अब मने तो पढ़बों कोणी आवे । पर थे कह रिया हो तो साचो ही कह रिया ओला ।” रामफुल ने हल्की सांस लेकर कहा ।
“इस बात को ऐसे टालने से कोई फाइदा नहीं है । तुम नहीं जानते, ये मनुवादि लोग हमारा किस तरह से शोषण करते है ? हमें मंदिरो के अंदर नहीं जाने देते, हमारे साथ छूआछूत करते है ।”
“थारा साथ भी! पर थे तो इतना बड़ा अफसर छो और म तो सुनयो छू कि शहर मे हर कोई थाके आगे हाथ जोड़े है बड़ा बड़ा पंडित भी?” रामफुल ने आश्चर्य से कहा । यह सुनकर गोविंद एक पल के लिए सकपका गया
“अरे वो तो इन मनुवादियों की चाल है, ऊपर से कुछ और अंदर से कुछ वरना तो तेरे को पता ही है सब । चल छोड़ ये बात, एक काम करना है तेरे को ।”
“हाँ बोल काई काम छ?”
“ये मनुवादी सरकार पदनोतती मे आरक्षण खत्म कर रही है तो हम एससी एसटी लोग सरकार के खिलाफ एक रैली निकाल रहे है । लाखो लोग प्रदर्शन करेंगे । तू भी गाँव के बाकी लोगो के साथ आ जाना शहर ।”
“पर मारो काम!”
“अरे! यहाँ हम दलितो का आरक्षण खतरे में है और तुझे काम की पड़ी है? तू दिन भर जूतियाँ बना और बेच कर कितने कमा लेता होगा? 100-200 ज्यादा से ज्यादा 300, ये ले 500 रुपए । और वहाँ आएगा तो खाना भी मिलेगा ।”
“अच्छा ठीक छ ।”
“ध्यान रखना, परसो सुबह 6 बजे यहाँ गाँव से बस चलेगी, बाकी गाँव वालों के साथ आ जाना तू ।”
“अच्छा आ जाऊलो ।”
रैली वाले दिन शहर के अंबेडकर चौक पर
“मनुवादी सरकार मुर्दाबाद ।”
“मनुवादी सरकार हाय हाय ।”
“मनुवादियों होश मे आओ ।”
“जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जाएग ।”
“भीख नहीं हक मांग रहे है। पदनोती मे आरक्षण दो ।”
हजारो लोगो की भीड़ नारे लगा रही थी जिसमे रामफूल भी शामिल था । उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि ये नारे क्यू लग रहे है और इससे क्या होगा, पर फिर भी वो बड़े जोश से आगे बढ़ बढ़ कर नारे लगा रहा था । शायद ये उन 500 रुपयो का असर था जो उसे गोविंद राम से हासिल हुये थे । रैली चली जा रही थी, चारो तरफ पुलिस का तगड़ा बंदोबस्त था । तभी अचानक भीड़ में से किसी ने उधर से गुजर रही एक चलती बस पर पत्थर फेंका । फिर तो पत्थरो की बरसात होने लगी । यह देखकर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज शुरू किया, जिसने आग में घी का काम किया । प्रदर्शनकारी बेकाबू हो उठे और उन्होने पुलिस पर जवाबी हमला शुरू किया । बेचारा रामफुल यह देखकर घबरा गया । उसकी ज़िंदगी मे यह पहला मौका था जब पुलिस से उसका ऐसे सामना हो रहा था । तभी ना जाने कहाँ से एक पत्थर उसके माथे पर आ लगा और वो उधर ही नीचे गिर पड़ा । पुलिस ने भी अब गंभीरता को देखते हुये आँसू गेस और रबर की गोलियां चालानी शुरू कर दी । यह देखकर उन प्रदर्शनकारियो में हड़कंप मच गया और वो इधर उधर भागने लगे और इस भगदड़ मे रामफुल का क्या हाल हो रहा था, ये देखने वाला कोई नहीं था ।

कुछ महीनो के बाद
“अरे शर्मा जी! लीजिये मिठाई खाइये ।”
“क्या बात है खन्ना साब, किस बात की मिठाइयाँ बांटी जा रही है?”
“अरे शर्माजी! वो मेरा प्रमोशन हो गया है, चीफ मैनेजर बन गया हूँ ।”
“अच्छा अभी जो प्रमोशन की लिस्ट निकली है उसमे आपका भी नाम है ?”
“जी शर्मा जी! कुछ आपकी दुआओ का असर है और कुछ उस रैली का जिससे घबरा कर सरकार झुक गई थी और नौकरी में प्रमोशन खत्म करने वाले अध्यादेश को वापस ले लिया ।”
“अरे वाह खन्ना साब! बधाई हो एक बार फिर से, कसम से आरक्षण का असली लाभ तो आप उठा रहे हो । पिताजी सरकारी नौकरी से रिटायर, खुद सरकारी नौकरी और अब ये प्रोमोशन और बच्चे आरक्षण से आई आई टी और मेडिकल कर रहे है । कुछ अपने समाज के बारे मे भी सोचा है ।”
“अरे शर्मा जी! घर परिवार से फुर्सत ही कहाँ मिलती है? आप तो जानते ही है इस महंगाई के जमाने मे कितना खर्च हो जाता है और फिर सरकार तो है ही सोचने के लिए ।” कहते हुये खटनवालिया मतलब खन्ना साब ने एक जोरदार अट्ठास लगाया, जिसमे शर्मा जी ने बराबर का साथ दिया ।

कुछ सालो बाद नाथपुरा गाँव का वही रामफुल का घर । कुछ फर्क था तो इतना कि अब टूट फूट के बजाय घर की थोड़ी सी मरम्मत हो गई थी बाकी कुछ भी नहीं बदला था । उस घर के बाहर आज भी उस दिन की तरह एक सूटबूट वाला लगभग 30 साल का आदमी आवाज लगा रहा था ।
“कोई है घर में?”
आवाज सुनकर अंदर से उसी की उम्र का एक आदमी बाहर आया । उसने एक पुरानी सी खाकी रंग की पेंट और गंदी सी बानियाँ पहन रखी थी उसकी आंखो मे एक एक स्थायी उदासी ने अपना घर बनाया हुआ था ।
“जय भीम ।” उस सुट वाले ने उससे कहा ।
“राम राम भैया ।” उसने उस सूटबूट वाले आदमी को पहचानने की कोशीश की ।
“अरे मुझे नहीं पहचाना?” उस सूट बूट वाले आदमी ने कहा ।
“नहीं साब! मैंने आपको नहीं पहचाना ।” उस आदमी ने जवाब दिया ।
“अरे! तुम रामफूल चाचा के बेटे राकेश ही हो ना?” उस आदमी ने पूछा ।
“हाँ साब! पर आप मेरे पिताजी को कैसे जानते है?” उसने आश्चर्य से कहा ।
“अरे! मैं तुम्हारे ही गाँव के गोविंद राम का बेटा प्रदीप हूँ ।” उस सूट बूट वाले ने जवाब दिया ।
“अरे प्रदीप भैया आप! आइये अंदर आइये ।” कहते हुये राकेश ने प्रदीप को अंदर बुलाया । प्रदीप को राकेश द्वारा इस प्रकार भैया पुकारना अच्छा नहीं लगा, उसने एक बुरा सा मुंह बनाया और मकान के अंदर बरामदे में आया और चारो तरफ अपनी नजर दौड़ाई ।
“अरे बेटा राजू! जा प्रदीप चाचा के लिए एक कुर्सी तो लेकर आ ।” राकेश ने आवाज लगाई । अंदर के टूटे फूटे कमरे से एक 6-7 साल का लड़का एक पुरानी सी कुर्सी लेकर आया । प्रदीप ने उस कुर्सी को देखकर मुंह बनाया, जिसे देखकर राकेश ने कहा ।
“अब प्रदीप भैया! हम गरीबो के पास तो यही है बैठने के लिए । ये मेरा बेटा है राजू ।” राकेश ने अपने बेटे की तरफ इशारा किया और फिर अपने बेटे से बोला-“प्रदीप चाचा के पैर छूओ और अंदर जाकर अपनी माँ को चाय बनाने के लिए बोलो ।”
लड़के ने प्रदीप के पैर छूये और अंदर चला गया । प्रदीप कुर्सी पर बैठने के बजाय खड़ा ही रहा । राकेश ने उसे फिर बैठने के लिए नहीं बोला पर खुद नीचे वहाँ बैठ गया, जहां पर बैठ कर वो चमड़े की जूतियाँ बना रहा था । चमड़े की बदबू जब प्रदीप से बरदास्त नहीं हुई तो उसने राकेश से कहा-“चलो बाहर चलते है, मुझे तुमसे बहुत जरूरी बात करनी है ।”
राकेश प्रदीप को बाहर जाता देखकर सबकुछ समझ गया था फिर भी उसने कुछ नहीं बोला और उसके साथ उसके पीछे पीछे मकान के बाहर आ गया ।
“हाँ प्रदीप भैया! आज इस गरीब की झोपड़ी में कैसे आना हुआ?”
“तुम्हें पता भी है ये सरकार क्या करने जा रही है?”
“नहीं भैया! क्या करने जा रही है सरकार?”
“ये सरकार हम लोगो का आरक्षण खत्म करने जा रही है ।”
“भैया! मैं समझा नहीं, हालांकि मैं ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाया पर अखबार पढ़ता रहता हूँ । हर नौकरी के लिए आरक्षित वर्ग की अलग सीटस लिखी हुयी होती है ।” “अरे तुम कुछ नहीं समझते, ये सब इस मनुवादी सरकार की चाल है । अब सरकार डाइरैक्ट तो आरक्षण खत्म नहीं कर सकती, पर धीरे धीरे सरकारी नौकरी कम करती जा रही है और हर चीज में प्राइवेट सैक्टर से कोंटेक्ट कर रही है ।”
“भैया! मैं अब भी नहीं समझा, आप क्या कहना चाहते है?”
“अरे तुम तो कहते हो तुम अखबार पढ़ते हो पर तुमने दो दिन पहले का अखबार नहीं पढ़ा क्या? सरकार कुछ सरकारी स्कूल बंद करके उन्हे प्राइवेट सैक्टर को सौंपने जा रही है । अब उन स्कूलो में सरकारी टीचर के बजाय प्राइवेट टीचर पढ़ाएंगे ।”
“अरे भैया! ये तो बहुत अच्छी बात है, अब हमारे बच्चे भी प्राइवेट स्कूल जैसी पढ़ाई कर पाएंगे ।”
“तुम गंवार के गंवार ही रहोगे, ऐसे मे तुम इन मनुवादी सरकार की चाल नहीं समझ पा रहे हो ।”
“कैसी चाल भैया?”
“अरे! ये मनुवादी सरकार उन स्कूलो में हम एससी/एसटी लोगो की भर्ती थोड़े ही करेगी, वहाँ पर सिर्फ जनरल वाले ही पढ़ाएंगे । और सिर्फ स्कूल ही क्यूँ, ये सरकार हर चीज को प्राइवेट को सोपने जा रही है अस्पताल, रेल्वे स्टेशन, सफाई विभाग सभी को ।”
“पर भैया! ये तो बहुत अच्छी बात है । प्राइवेट में रहेंगे तो हमे भी अच्छी सुविधाए मिलेगी । अभी गाँव के सरकारी अस्पताल में डॉक्टर ज़्यादातर आते ही नहीं है और आते भी है तो ऐसी दवाई देते है, जिससे ठीक ही नहीं हो पाते पर जब उसी डॉक्टर के घर पर जाते है, फीस देते है, तो बीमारी भी तुरंत गायब हो जाती है । स्कूल में भी मास्टर जब देखो छुट्टी पर रहते है । और सरकार कभी ऐसा करने वाले सरकारी डॉक्टर, मास्टर, बाबुओ पर कुछ कार्यवाही करती है तो ये लोग तुरंत हड़ताल पर चले जाते है और सरकार को अपना कदम वापस लेना पड़ता है ।”
“तुम बिलकुल पागल हो, तुम इन मनुवादियों के बहकावे मे आ गए हो । तुम्हारी आदत गुलामी की पड़ी हुयी है और तुम्हें वहीं करनी है इन लोगो की । ये भी नहीं समझ रहे सरकार हम लोगो का आरक्षण खत्म कर रही है ।”
“हम गरीबो का कैसा आरक्षण भैया? हम लोगो को तो 2 जून की रोटी भर पेट खाने को मिल जाए तो बहुत है । हम लोगो के आरक्षण पर तो आप लोगो ने कब्जा जमाया हुआ है । आपके दादा सरकारी नौकरी में थे । आपके पिताजी सरकारी नौकरी मे है और अब आप भी आरक्षण की वजह से सरकारी नौकरी कर रहे है । हम लोगो की किस्मत में आरक्षण कहाँ?”
“साले तुम लोग जलते हो हमसे । अब तुम पढ़ लिख नहीं आए तो इसमे हमारा क्या दोष? बाबा साब ने तो तुम लोगो के लिए स्कूल के दरवाजे खोल रखे है । ये देख इस साल एक जूते बनाने वाले का बेटा भी आईएएस बना है । साले तू भी पढ़ लिख लेता और बन जाता कलेक्टर !”
“हाँ बन जाता मैं भी कलेक्टर अगर मेरा बापू आपके पिता की बातों मे नहीं आता तो । नौकरी में नहीं होने के बावजूद सरकारी पदनोती में आरक्षण बचाने वाली रैली में गया था । वहाँ जाकर आपके पिता का पदनोती में आरक्षण तो बचा लिया पर अपनी टांग नहीं बचा पाया और बिस्तर पकड़ लिया । मुझे पढ़ाने के लिए साहूकार से जो कर्जा लिया था उसे चूकाने के लिए मुझे भी अपने बापू का ही धंधा अपनाना पड़ा । और आप 100 आरक्षण वाले में से एक जूते बनाने वाले का उदाहरण दे रहे हो । बाकी के 99 लोगो के बारे में भी बता दो उनके परिवार वाले क्या करते है ? सब के सब उच्च सरकारी नौकरी में मिलेंगे वो भी आरक्षण की वजह से । बाबा साब ने स्कूल के दरवाजे खोले ताकि हर गरीब दलित को पढ़ने का हक मिले, वो हक मिला भी पर अगर कोई गरीब नहीं पढ़ पाता तो क्या समाज के उच्च वर्ग का ये फर्ज नहीं बनता कि वो उनकी मदद करे । पर जब हम जैसा गरीब मदद मांगने जाता है तो मदद करना तो दूर, बल्कि उसके मुंह पर दरवाजा बंद कर लिया जाता है । क्यूँ इसलिए ना कि अगर मदद कर देंगे तो हम लोग भी आप लोगो के बच्चों की तरह बराबरी कर लेंगे । माना कुछ ऊंची जाती वाले हमारी जाती की वजह से हमसे भेदभाव करते है, पर ये भेदबाव तो अभी थोड़ी देर पहले आपने भी तो किया था । एक मिनट उस जगह बैठ नहीं सके जहां मैं चमड़े का काम कर रहा था । भैया! पहले खुद अपने में तो सुधार लाओ, फिर किसी मनुवादि को दोष देना ।”
“तू मुझे समझा रहा है? लगता है तू मनुवादियों का गुलाम है और रहेगा । अगर बाबा साहब ने आरक्षण नहीं दिया होता तो तेरा बच्चा स्कूल नहीं जा रहा होता । ”
“भैया! चलो मैं मनुवादियों के खिलाफ बोलूँगा पर करो हमारी मदद हमे भी आगे बढने के लिए । ज्यादा नहीं थोड़ी सी वो सुविधाए हमारे बच्चो के लिए भी लाकर दो जो तुम्हारे बच्चों को मिल रही है, या फिर अपने बच्चो को भी हमारी तरह सरकारी स्कूल में पढ़ाओ ताकि हमारे दोनों के बच्चे बराबर आरक्षण का लाभ उठा सके । बोलो, है भैया हिम्मत?”
“मदद मांगनी है तो जाकर सरकार से मांग ।”
“भैया! सरकार वहीं तो करने जा रही है । हमारे बच्चो को भी प्राइवेट स्कूल जैसी सुविधाए देकर ।”
“तू मूर्ख है और मूर्ख ही रहेगा । तू जाकर इन मनुवादियों के तलवे चाट, जय भीम।” कहता हुआ प्रदीप वहाँ से चला गया ।
“जय भीम भैया, जय राम जी की” पीछे से राकेश ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुये कहा ।

Thursday, October 28, 2021

नया जन्म

संजय राठोड़ कल रात से बहुत परेशान था| वह भारतीय सेना में सूबेदार के पद पर कार्यरत था जिसकी तैनाती कारगिल में थी| वह 15 दिन पहले ही अपनी 60 दिन की वार्षिक छुट्टियाँ लेकर अपनी गर्भवती पत्नी की देखभाल के लिए घर आया हुआ था| जब वो अपने तैनाती स्थल से अपने घर के लिए निकला था तब तक वहाँ पर सब कुछ सही चल रहा था| पर पिछले 5-6 दिनों से सरहद के उस पार से भारतीय सीमा में घुसपेठ की खबरे आ रही थी| उसके साथियों की छुट्टियाँ रद्द हो चुकी थी और उन्हे जल्द से जल्द अपनी पोस्टिंग पर लौटने के लिए कहा गया था| हालांकि उसको अभी तक बुलावा नहीं आया था, पर यह जानकर कि उसकी मातृभूमि पर संकट आया हुआ है, वह भी जल्दी से जल्दी कारगिल जाना चाहता था| पर वह यह सोचकर परेशान था कि उसके पीछे से उसकी गर्भवती बीवी को किसके पास छोड़कर जाएगा, उसकी देखभाल कौन करेगा? ऐसा नहीं था कि उसके परिवार में कोई और नहीं था| उसके परिवार में सब थे, माता-पिता,भाई-बहन, पर उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया था| उसकी वजह थी कि उसने अपने घरवालो के विरुद्ध जाकर अपने महाविध्यालय में साथ पढ़ने वाली काजल से शादी की थी| काजल निम्न जाति समझे जाने वाली महार जाती से थी| संजय ने अपने माता-पिता को समझाने की बहुत कोशिश की थी कि आज के जमाने में जात-पात व्यर्थ बात है| उसकी माँ तो फिर भी काजल को अपनाने के लिए तैयार हो गई थी पर उसके पिताजी पुराने विचारों के थे और आज भी उन्हे अपनी ऊंची जाती पर अभिमान था| उन्होने काजल को अपनाने से साफ इंकार कर दिया था| मजबूरन संजय ने काजल के साथ कोर्ट में विवाह किया और शहर में अलग मकान लेकर रहने लग गया था| पढ़ाई पूरी करने के बाद संजय भारत माँ की सेवा करने के अपने बचपन के सपने को पूरा करने के लिए भारतीय सेना में भर्ती हो गया वहीं पर काजल एक विध्यालय में पढ़ाने लग गई| साल में 1 बार अपनी वार्षिक छुट्टियों में ही वो काजल से मिल पाता था| जब काजल गर्भवती हुई थी तो उसने ये समाचार अपने माता-पिता को बताने के लिए काजल को लेकर उनके पास गया था पर उसके पिता ने उसके मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया था और दुबारा वहाँ कभी नहीं आने के लिए कहा था| रात भर वो इसी उधेड़बुन में था कि उसके जाने के बाद काजल की इस हालत में देखभाल कौन करेगा और इसी वजह से वो सो नहीं पाया था| काजल उसकी इस परेशानी को समझ गई थी| उसने सुबह होते ही संजय से कहा –“ मैं अपनी सहेली को अपने पास बुला लेगी, आपको चिंता करने के बिलकुल भी जरूरत नहीं है| इस समय मुझसे ज्यादा भारत माँ को आपकी जरूरत है| बस आप जल्दी सीमा पर जाकर दुश्मन को सबक सिखाइए|” उसकी बात सुनकर संजय थोड़ा बहुत चिंतामुक्त हुआ| उसने अपना बेग उठाया और स्टेशन की और चल पड़ा| उसकी बीवी उसको विदा करने के लिए स्टेशन तक आई| उसने मुड़ कर देखा तो लगा बीवी के साथ उसका बेटा भी उसे दुश्मन से लड़ने के लिए शुभकामनायें दे रहा है| संजय को सरहद पर गए 5 दिन हो गए थे| कारगिल की पहाड़ियों में दुश्मन अपना कब्जा जमा लिया था और भारतीय सेना ने उनको भगाने के लिए उनके खिलाफ कार्यवाही प्रारम्भ कर दी थी| उसके पीछे काजल अब घर में अकेली थी| उसने अपनी सहेली को बुलाना चाहा पर उसकी सहेली शहर से बाहर गई हुई थी| उसे बहुत परेशानी हो रही थी पर वो अपनी परेशानी किसी को भी बता नहीं सकती थी| वो बस भगवान से लड़ाई को जल्दी से जल्दी खत्म करने की प्रार्थना करने लगी थी ताकि उसका पति उसके पास लौट सके| सुबह के 11 बज रहे थे और काजल अपने घर में बिस्तर में लेटी हुई थी कि तभी बाहर से किसी ने बेल बजाई| वो किसी तरह से बिस्तर से उठी और दरवाजा खोला तो पाया कि सामने संजय के माता-पिता खड़े थे| उसने नीचे झुक कर उन्हे प्रणाम करना चाहा पर संजय की माँ ने उसे बीच में ही रोक लिया और अपने गले से लगा लिया| तभी काजल की नजरे सामने की तरफ गई तो वो चौंक पड़ी| कुछ सैनिक एक ताबूत को लेकर खड़े थे और फिर जैसे वो सब समझ गई थी| उसके मुंह से एक ज़ोर सी चीख निकली और आँखों से आँसूओं की धारा बह निकली| तभी संजय के पिता ने कहा-“नहीं बेटी रोते नहीं है| तुम्हारा पति देश के लिए शहीद हुआ है| मेरे बेटे ने देश के लिए जान दी है पर उसने मेरी सोच को एक नया जन्म दिया है| जब देश की रक्षा करने वालों में हम जाति नहीं देखते, फिर क्यों मैं अपनी बहू में जाति देखने लग गया था| मुझे माफ कर दो बेटी|”

Tuesday, September 29, 2020

ताराचंद शर्मा राजस्थान राज्य के अलवर जिले के एक गाँव के सरकारी माध्यमिक विद्यालय में गणित के अध्यापक है| पिछले कुछ दिनों से वो बहुत परेशान थे| कोरोना -19 महामारी के चलते देश में मार्च से लॉकडाउन लागू किया गया था| लॉकडाउन में आपातकालीन सेवाओं को छोड़कर सभी औद्योगिक प्रतिष्ठानों, परिवहन सेवाओं, खेल, सिनेमा आदि के साथ साथ शैक्षिक संस्थानों की गतिविधियों पर भी रोक लगा दी गई थी| उनका विद्यालय भी तब से बंद ही था| समय के साथ-साथ कई इकाइयां कोरोना -19 महामारी से बचाव के सुरक्षा उपायों को अपनाकर शुरू हो गई थी| देश और राज्य के अधिकांश विद्यालयों में भी ऑनलाइन माध्यम से बच्चों की कक्षा शुरू हो चुकी थी, जिसमे बच्चे मोबाइल या कम्प्युटर का इस्तेमाल करके घर पर ही अध्यापकों से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे| पर यह सुविधा सभी बच्चों को हासिल नहीं थी| दूर गावों में, जहां पर मोबाइल कम्प्युटर या अच्छी इंटरनेट कनेक्टिविटी की सुविधा नहीं थी, वहाँ रहने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई नहीं कर पा रहे थे| यहीं ताराचंद शर्मा की परेशानी का कारण था| उनके विद्यालय के बच्चे भी अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पा रहे थे| ताराचंद शर्मा जब 5 वर्ष पहले इस विद्यालय में पढ़ाने के लिए आए थे, तब विद्यालय में पढ़ाई की स्थिति, खासतौर पर गणित की स्थिति बहुत खराब थी| बच्चे पढ़ाई में बिलकुल भी ध्यान नहीं देते थे| पढ़ाने के लिए पूरा स्टाफ भी नहीं था और जो कुछ शिक्षक वहाँ थे, वो भी जल्दी से अपना ट्रान्सफर शहर में करवाना चाहते थे, इसलिए वो मन लगाकर नहीं पढ़ाते थे| परिमाणस्वरूप विद्यालय का दसवीं बोर्ड परीक्षा परिणाम भी 10-20% से ज्यादा नहीं रहता था| कई अभिभावकों ने अपने बच्चों को विद्यालय से निकालकर शहर के निजी विद्यालय में प्रवेश करवा दिया था और सिर्फ गरीब परिवारों के बच्चे ही विद्यालय में पढ़ते थे| ताराचंद शर्मा खुद एक गरीब परिवार से थे और बढ़ी मुश्किलों से अपनी पढ़ाई को जारी रखते हुये अपनी मेहनत और लगन से आज एक अध्यापक बने थे| उन्होने विद्यालय की स्थिति को सुधारने का निर्णय लिया और बच्चो को मन लगाकर पढ़ाने लग गए| गणित के साथ साथ वो विज्ञान भी पढ़ाया करते थे| दूसरे साथी अध्यापक शुरू में उसका मज़ाक उड़ाते थे, पर बाद में उनकी लगन देखकर वो भी बच्चों को मन लगाकर पढ़ाने लग गए| उस वर्ष पहली बार विद्यालय दसवीं बोर्ड परीक्षा का परिणाम 60% से ज्यादा था, वही गणित में सभी बच्चे पास हुये थे| यह देखकर सभी अध्यापको का जोश दुगना हो गया और वो बच्चों पर और ज्यादा मेहनत करने लग गए| दूसरे साल विद्यालय का परीक्षा परिणाम 85% से ज्यादा रहा| यह देखकर गाँव के अभिभावकों, जिन्होने अपने बच्चो का प्रवेश शहर के निजी विद्यालय में करवाया था, उन्होने वापस गाँव के विद्यालय में करवा दिया| ये ताराचंद शर्मा और दूसरे अध्यापको की मेहनत का नतीजा था कि पिछले 3 वर्षों से विद्यालय का दसवीं बोर्ड परीक्षा का परिणाम ना सिर्फ 100% प्रतिशत रहा बल्कि पिछले वर्ष विद्यालय के 2 विध्यार्थीयों ने मेरिट लिस्ट में अपना स्थान भी बनाया था| अलवर जिला कलेक्टर ने गाँव के विध्यालय को जिले के सर्वश्रेष्ठ विद्यालय की उपाधि से सम्मानित किया था| “क्या कोरोना महामारी की वजह से विद्यालय का नाम खराब हो जाएगा?” सोचते हुये ताराचंद शर्मा परेशान हो उठे थे| -“नहीं नहीं मैं ऐसा कभी नहीं होने दूँगा|” सोचते हुये उन्होने एक निश्चय किया और अपने साथी अध्यापकों के साथ एक चर्चा की| चर्चा में उन्होने सोशल डिस्टेन्स के साथ 9वी-10वी के बच्चों को पढ़ाने का सुझाव दिया, जिसमे एक ग्रुप में सिर्फ 8-10 बच्चे हो और अध्यापक उन्हे दूर से पढ़ाये| सभी अध्यापक उनके इस सुझाव से सहमत थे| उन्होने इसके लिए तैयारी शुरू कर दी| ताराचंद शर्मा ने जिला कलेक्टर से मिलकर पूरी बात बताई और पूरे सुरक्षा साधनो के साथ बच्चों को पढ़ाने के लिए आज्ञा ली| विद्यालय को पूरी तरह से सेनीटाइज़ करवाया गया और जगह जगह हाथ को धोने के लिए सेनीटाइज़र रखे गए| तापमान मापने के लिए डिजिटल थर्मामीटर लाया गया| बच्चो को मास्क बाटें गए| और इस तरह से उन्होने सोशल डिस्टेन्स के साथ बच्चों को पढ़ाना शुरू किया| ताराचंद शर्मा आज खुश थे कि मोबाइल, कम्प्युटर, इंटरनेट कनेक्टिविटी जैसे संसाधनों की कमी की वजह से उनका विद्यालय शहरी निजी विद्यालयों से पीछे नहीं रहेगा|

Sunday, May 31, 2020

समय चक्र

रात को खाना खाने के बाद मैं हमेशा की तरह अपने घर के बाहर बने हुये लान में टहल रहा था|
ऑफिस में प्रोजेक्ट को लेकर मन में कुछ उलझन थी जिससे निजात पाने हेतु मैंने अपने होंठो में सिगरेट सुलगा ली थी और टहलते हुए उसका धीरे धीरे कश लिए जा रहा था|
शुरू से हीं ऐसी हर परेशानी का हल मैंने सिगरेट के धुएँ में ढूंढा था । ये आदत मुझे मेरे पिताजी से विरासत में मिली थी|

इसी दौरान अचानक पीछे से आकर किसी ने मेरे कुर्ते को पकड़ लिया| मुड़ कर देखा तो पाया मेरा 8 साल का बेटा आरव था| मैंने उससे इशारों में पूछा- “क्या काम है?”
“पापा प्लीज आप सिगरेट मत पिया करो| ये सेहत के लिए बहुत नुकसानदायक है| टीवी में भी यही दिखाते है और विद्यालय में मेरे गुरुजी भी यहीं कहते है कि बीड़ी सिगरेट पीना बुरी बात होती है|”
एक तो वैसे ही मैं अपने काम से परेशान था, दूसरा उसका इस तरह से मुझे बोलना, मुझे एकदम से गुस्सा आ गया| उसके गाल पर थप्पड़ मारते हुये मैं गुस्से से चिल्ला पड़ा था-“जा, जाकर अंदर पढ़ाई कर, मेरा बाप बनने की कोशिश मत कर|” थप्पड़ पड़ते ही आरव रोता हुआ घर के अंदर भाग गया|
उसके जाने के बाद मुझे भी अपनी हरकत पर दुख हुआ पर अब कुछ नहीं हो सकता था|
मैं वापस सिगरेट में खो गया था| तभी अचानक मुझे मेरी माँ की आवाज ने चौंका दिया-“बेटा क्या गलत कहा था आरव ने जो तूने उसे थप्पड़ मार दिया? भूल गया तेरे पिताजी कितनी सिगरेट पीते थे और तू कैसे उन्हे मना करता था| काश तेरे पिताजी ने तेरी बात मानी होती वो आज...” कहते कहते माँ रो पड़ी थी| माँ की बात सुनते ही मेरी आँखों के सामने जैसे मेरे बचपन के दृश्य साकार हो उठे थे|
“पापा प्लीज आप सिगरेट मत पिया करो| ये सेहत के लिए अच्छी नहीं होती| इससे कैंसर हो जाता है|” मैं अपने पिता से कह रहा था| उस समय मैं भी लगभग 8-9 साल का ही होगा|
और पापा का जवाब था- “बेटा मैं जानता हूँ, बीड़ी सिगरेट सेहत के लिए ठीक नहीं है, पर क्या करू? जब भी मुझे कोई परेशानी होती है बस तब ही मैं सिगरेट पीता हूँ| सिगरेट पीने से दिमाग को आराम मिलता है और मैं अपनी परेशानी भूल जाता हूँ|”
“पापा जब भी आप परेशान हो, मेरे साथ खेला करो सब परेशानी दूर हो जाएगी|” मैंने मुस्कराते हुये कहा|
“ठीक है मेरे बाप|” कहते हुये पापा ने सिगरेट छोड़ दी और मेरे साथ खेलने लग गए थे|
“पापा! आज फिर आपने सीट बेल्ट नहीं लगाई|” पापा कार स्टार्ट कर रहे थे और मैं उनके बगल में बैठा हुआ उन्हे डांट रहा था| मैंने अपनी सीट बेल्ट पहले ही लगा ली थी|
“अरे...अरे... मैं बस पहनने ही वाला था, उससे पहले ही तूने बोल दिया?” पापा ने झेपते हुया कहा
“पापा झूठ बाद में बोलिए पहले सीट बेल्ट लगाइए|”
“ओके मेरे बाप लगाता हूँ|” कहते हुये उन्होने सीट बेल्ट लगा ली और कार चालू की| उन्होने पहले मुझे मेरे स्कूल में छोड़ा और फिर अपने काम को चल दिये|
मेरे पापा का खुद का कपड़ो का बिजनेस था जिसे वो अपने एक बचपन के मित्र के साथ साझेदारी में चला रहे थे| हमारी ज़िंदगी में सब कुछ सही चल रहा था| हाँ पापा अब भी सिगरेट पीते थे और बोलने पर हमेशा यहीं जवाब देते थे वो थोड़ा परेशान है और सिगरेट पीने से उनको दिमागी आराम मिलता है| पर मेरे बोलने पर वो छोड़ देते थे और मेरे साथ खेलने लग जाते थे| ऐसे ही कुछ साल गुजर गए मैं अब 15 साल का हो गया था| पापा पिछले कुछ दिनों से पहले से ज्यादा सिगरेट पीने लग गए थे, शायद वो अब कुछ ज्यादा परेशान रहने लग गए थे| पर एक तो अब मैं बड़ा हो गया था, दूसरा मेरा दसवी बोर्ड की परीक्षा का साल था, तो मेरा ज़्यादातर समय अब पढ़ाई में गुजरने लग गया था| मेरा पापा के साथ खेलना अब लगभग न के बराबर हो गया था, इसलिए मैं नहीं जान पाया था कि वो अब किस परेशानी से गुजर रहे है? और जब मैंने पापा की परेशानी को जाना, तब तक बहुत देर हो चुकी थी| एक दिन अचानक पापा की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई| उन्हे हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया तो पता चला ज्यादा धूम्रपान करने की वजह से पापा को कैंसर हो गया | तब पापा ने बताया कि उनके बचपन के मित्र जिनके साथ उनका कारोबार था , जिन पर वो सबसे ज्यादा भरोसा करते थे, उन्होने बिजनेस में उन्हें धोखा दिया था।  इस सदमे से वो उबर ना पाये और सदा तनाव में रहने लगे थे और उस परेशानी से मिथ्या  निजात उन्हे उनकी फेवरिट सिगरेट हीं दिला पाती थी | इस सिगरेट रूपी धीमे जहर से उन्हे कब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो गई, उन्हे पता भी नहीं चला| पापा के इलाज़ में धीरे धीरे हमारी सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई, मकान बिक गया पर पापा ठीक नहीं हुये और एक दिन वो हमें अकेला छोड़ा कर इस दुनियाँ से चले गए| पापा के जाने के बाद माँ ने बड़ी मुश्किल से हमारे परिवार को संभाला| मैंने कसम खाई थी मैं कभी कोई नशा नहीं करूंगा पर वो कसम जल्दी ही टूट गयी जब मैंने इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश लिया| कॉलेज में मुझे एक लड़की से प्यार हुआ और जल्दी ब्रेकअप भी हो गया| ब्रेकअप के बाद मैं बहुत परेशान रहने लगा था ।
मेरी इस हालत में किसी दोस्त ने सिगरेट पकड़ाते हुए कहा कहा-“ये ले , एक कश खींच, तेरी सारी परेशानी दूर हो जाएगी|” उसकी बात सुनकर मुझे मेरे पापा की बात याद आ गई-“ सिगरेट पीने से दिमाग को आराम मिलता है|” सिगरेट पीने से पापा का क्या अंजाम हुआ था ये मुझे याद था, मुझे मेरी कसम याद थी; पर मेरा दिमाग इतना ज्यादा परेशान हो चुका था कि मैं आगे की सोचे बिना सुट्टा लगाने लगा| सिगरेट पीते ही जैसे दिमाग को कुछ शांति सी पहुंची थी| धीरे धीरे मुझे सिगरेट की आदत होने लगी थी और जब भी किसी परेशानी में होता, मुझे सिगरेट के अलावा कुछ और नहीं सूझता| इंजीनियरिंग करने के बाद मैं एक सॉफ्टवेयर कंपनी में जॉब करने लगा | जॉब लगते ही मैंने माँ की पसंद की लड़की से शादी कर ली और शादी के 2 साल बाद आरव पैदा हुआ| जब वो थोड़ा बड़ा हुआ तो उसकी आदतें मेरे बचपन की आदतों से मिलने लगी| जैसे किसी गलती पर मैं अपने पापा को टोक देता था, मेरा बेटा भी मुझे टोकने लग गया था| बाईक पर हेलमेंट ना लगाने पर, कार में सीट बेल्ट ना लगाने पर, रेड लाइट पर सिग्नल तोड़ने पर हर बात पर वो मुझे नियम बताता| मेरे सिगरेट पीने पर भी वो मुझे टोकता था और आज से पहले मैं भी सिगरेट छोड़ कर उसके साथ खेलने लग जाता था| पर आज दिमाग कुछ ज्यादा परेशान था| ऑफिस में प्रोजेक्ट को पूरा करने की डेडलाइन मिल चुकी थी और प्रोजेक्ट तैयार नहीं था, जिसकी वजह से दिमाग आज अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत ज्यादा परेशान था और उसी परेशानी का समाधान मैं सिगरेट में ढूंढ रहा था| और इन्हीं हालातों  से आज मैंने आरव को पहली बार इस तरह से डांट कर भगा दिया था| माँ की बात सुनकर जैसे मुझे होश आ गया था| बचपन में हम सब कितने मासूम होते है| हर नियम का पालन करते है, अच्छे बुरे का ज्ञान होता है और बुराई से दूर रहते है| बड़े होने के बाद ना जाने क्यों हम  बचपन की उस अच्छाई को भूल जाते है| अच्छे बुरे का ज्ञान होने के बावजूद हम बुराई को अपनाते है| मुझे लगा, जैसे मेरे पापा ही इस जन्म में आरव बन कर मेरी ज़िंदगी में आए है, बुराइयों से दूर करने आए है और जिस तरह से सिगरेट पीने की वजह से उनकी मृत्यु  हो गई थी, वो मुझे अपने उस आने वाले कल से बचाने आए है| मैंने तुरंत अपनी सुलगाई हुई सिगरेट को बुझा कर फेंक दिया और अपने कुर्ते की जेब से सिगरेट का पैकेट निकालकर घर के डस्टबिन में डाल दिया और अंदर आरव के साथ खेलने चल दिया जो मेरी परेशानी का सबसे बेहतर इलाज़ था| घर के अंदर घुसने से पहले मैंने एक बार आँगन में खड़ी हुई माँ पर नजर दौड़ाई, जिसकी आँखों में आँसू छलक रहे थे, पर मैं जानता था वो खुशी के आँसू थे|


                       

Friday, April 21, 2017

भूख

माँ भूख लगी है |
बस बेटा 10 मिनट रूको अभी गर्म गर्म रोटी सेंक देती हूँ |


बेटा भूख लगी है |
माँ काम वाली बाई को तो टाइम लगेगा खाना बनाने मे। तुम ऐसा करो रात की बची हुयी रोटी खा लो |